सक्ती। मुख्यमंत्री द्वारा वित्तीय वर्ष 2025-26 के तहत अपने स्वेच्छानुदान मद से 293 हितग्राहियों के लिए कुल चौबीस लाख बीस हजार रूपये की राशि स्वीकृत की गई है। सरकार की मंशा इस कोष से समाज के अंतिम छोर पर बैठे असहाय और गंभीर रूप से बीमार जरूरतमंदों को त्वरित आर्थिक राहत पहुंचाने की होती है, लेकिन हाल ही में जारी हुई सूची ने एक बड़े घालमेल और बंदरबांट की ओर इशारा कर दिया है। अनुदान की राशि तो जारी कर दी गई है, लेकिन यह राशि वास्तव में किसे मिली है, यह अब पूरे जिले में भारी चर्चा और आत्ममंथन का विषय बन गया है।
सूत्रों और जमीनी हकीकत से जो तस्वीरें छनकर सामने आ रही हैं, वे बेहद चौंकाने वाली हैं। आखिर ऐसी क्या नौबत आ गई कि सत्ता की धमक दिखाने वाले कुछ रसूखदार और ‘छूटभैये’ नेताओं को अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल कर अपनी पत्नी, सगे-संबंधी और करीबियों के नाम पर स्वेच्छानुदान की यह सरकारी राशि स्वीकृत करानी पड़ गई? हद तो तब हो गई जब जिले के ही एक कद्दावर नेताजी के गृह ग्राम में कई दर्जन लोगों को इस अनुदान का फायदा पहुंचा दिया गया। यह मुमकिन है कि इस सूची में जरूरतमंद नाम शामिल हों, लेकिन बहुसंख्यक चेहरे ऐसे हैं जो पहले से ही सत्ता के सुख और वैभव का भरपूर भोग कर रहे हैं। उनके पास दूर-दूर तक ऐसी कोई गंभीर आर्थिक तंगी या चिकित्सकीय आपातकाल नहीं है, जिसके लिए स्वेच्छानुदान का नियम बनाया गया है।
नियमों और कायदों की बात करें, तो मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान के अपने कड़े मायने और विधिक दायरे होते हैं। यह पैसा जनता की गाढ़ी कमाई का टैक्स है, जो सिर्फ और सिर्फ लाचारों की मदद के लिए आरक्षित होना चाहिए। परंतु, इन तमाम नैतिक और प्रशासनिक मर्यादाओं को धता बताते हुए कुछ स्वार्थी तत्वों ने अपनों को उपकृत करने की होड़ मचा रखी है। जैसे ही यह सूची सार्वजनिक हुई, राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। खुद सत्तारूढ़ दल (भाजपा) के कई निष्ठावान कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं ने इस बंदरबांट पर बेहद तल्ख और तीखे तंज कसे हैं। नाम न छापने की शर्त पर पार्टी के ही कुछ वरिष्ठ नेताओं ने खुलकर नाराजगी जाहिर करते हुए बताया कि इस तरह की रेवड़ी संस्कृति से धरातल पर पार्टी और सरकार की छवि बुरी तरह धूमिल हो रही है।
पार्टी के भीतर से ही उठ रहे सुर बताते हैं कि जो लोग आलीशान फोर-व्हीलर गाड़ियों में घूमते हैं, ठाट-बाट की जिंदगी बसर करते हैं, उन्हें आखिर सरकार के इस राहत कोष से 5 हजार या 10 हजार रुपये जैसी मामूली रकम झटकने की क्या मजबूरी आन पड़ी? यह बात आम जनता के भी गले नहीं उतर रही है। सबसे विडंबनापूर्ण स्थिति तो उन नेताओं की है जो चुनाव के वक्त बड़ी-बड़ी डींगें हांकते थे कि वे अपने दम पर, अपने खर्च से पार्टी का प्रचार कर रहे हैं और संगठन को मजबूत बना रहे हैं। आज सत्ता आते ही उन्हीं ‘महारथियों’ की हालत यह हो गई है कि वे 5-5 हजार रुपये के सरकारी अनुदान के लिए भी गिड़गिड़ा रहे हैं और अपने परिवार के खाते में पैसे डलवा रहे हैं।
संगठन और सरकार के शीर्ष नेतृत्व की आंखें इस गंभीर मामले पर कब खुलेगी
बड़े नेताओं को यह मर्म समझना होगा कि स्वेच्छानुदान की राशि यदि वास्तव में सही और पात्र व्यक्ति को मिले, तो जनता का सरकार पर भरोसा अटूट होता है और पार्टी को जमीनी स्तर पर असीम राजनीतिक लाभ मिलता है। इसके ठीक विपरीत, यदि यही जन-राहत का पैसा गलत, संपन्न और चाटुकार लोगों की जेब में जाएगा, तो इससे न केवल गरीब जनता का हक मरेगा, बल्कि पार्टी की साख को भी ऐसा अपूरणीय नुकसान पहुंचेगा जिसकी भरपाई भविष्य में मुमकिन नहीं होगी। समय रहते इस कथित सूची की स्क्रूटनी और रसूखदारों पर लगाम लगाना सरकार की साख के लिए बेहद जरूरी हो गया है।
ग्रामीण मंडल के पदाधिकारीयो ने दिखाई “पहलवानी” और “विजय” श्री प्राप्त किया
सूत्रों की माने तो जहां एक ओर स्वेच्छा अनुदान को लेकर नगर मंडल के पदाधिकारी को पूछा तक नहीं गया हैं वहीं ग्रामीण मंडल मंडल के पदाधिकारी ने खूब “पहलवानी” दिखाई है और अपने परिचितों और रिश्तेदारों को स्वेच्छाअनुदान का लाभ दिलाकर “विजय’ श्री भी प्राप्त किया है बताया जा रहा है ग्रामीण मंडल के पदाधिकारी ने अपने घर के लोगों को इसका भरपूर लाभ दिलाया है जबकि क्षेत्र में जिन जरूरतमंदों को इसकी जरूरत थी वह इस लाभ से कोसों दूर है। एक तरफ संगठन अंतिम छोर तक पहुंचने की कोशिश कर रही है वहीं कुछ लोग अपने निजी स्वार्थ सिद्धि के लिए संगठन के प्रयास को वीफल करने में लगे हुए हैं। जबकि आए दिन होने वाले प्रशिक्षण में पार्टी द्वारा यह स्पष्ट निर्देश दिया जाता है कि संगठन के पदाधिकारी सदैव निस्वार्थ रूप से कार्य करें ताकि संगठन की मजबूती और जनता के बीच में विश्वास सदैव बना रहे अब देखना है यह है कि मामले के सामने आने के बाद सत्ता और संगठन इस पर क्या रुख अपनाती है
