कवर्धा। छत्तीसगढ़ में विकास और कल्याणकारी योजनाओं के दावों के बीच कवर्धा जिले के पंडरिया विकासखंड का अंतिम गांव रुखमिदादर आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहा है। विशेष पिछड़ी बैगा जनजाति बाहुल्य इस गांव में भीषण गर्मी ने हालात को और भयावह बना दिया है। पानी और बिजली जैसी बुनियादी जरूरतें यहां आज भी अनिश्चित और अव्यवस्थित हैं।
प्यास से जूझता रुखमिदादर
गांव में पेयजल संकट विकराल रूप ले चुका है। हैंडपंपों का जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है और नल-जल योजनाएं धरातल पर प्रभावी नहीं दिखतीं। महिलाएं और बच्चे रोजाना मटके लेकर दूर-दूर तक पानी की तलाश में भटकते हैं। तपती धूप में एक से दो किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाना यहां की मजबूरी है।
विशेष पिछड़ी बैगा जनजाति, जो पहले से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर है, आज पानी के लिए संघर्ष कर रही है। सवाल उठता है कि आदिवासी अंचलों के लिए घोषित योजनाएं आखिर जमीन पर क्यों नहीं उतर पा रहीं।
बिजली के नाम पर सिर्फ वादा
रुखमिदादर में नियमित बिजली आपूर्ति आज भी सपना बनी हुई है। ग्रामीणों के अनुसार शाम 7 बजे से रात 10 बजे तक ही बिजली मिलती है, वह भी कई बार बाधित रहती है। दिनभर गांव उमस और अंधेरे में डूबा रहता है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और छोटे-मोटे कामकाज ठप पड़े हैं वो भी सौर ऊर्जा से ।
कई बार तो सोलर पैनल खराब पड़े रहते हैं और उनकी देखरेख की कोई स्पष्ट व्यवस्था नजर नहीं आती। नतीजतन, रोशनी की उम्मीद भी धुंधली हो चुकी है।
योजनाएं कागजों में, हकीकत में संघर्ष
विशेष पिछड़ी जनजातियों के उत्थान के लिए कई योजनाओं की घोषणा की गई है, लेकिन रुखमिदादर की स्थिति इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। भीषण गर्मी में जब शहरों में बिजली-पानी की मांग पर तत्काल कार्रवाई होती है, तब इस गांव के लोग दो वक्त के पानी और कुछ घंटों की बिजली के लिए जूझ रहे हैं।
रुखमिदादर की यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उन दूरस्थ आदिवासी बस्तियों की हकीकत है जो आज भी विकास की मुख्यधारा से बाहर हैं। अब देखने वाली बात यह है कि व्यवस्था इस पुकार को सुनती है या फिर बैगा जनजाति का यह गांव यूं ही प्यास और अंधेरे में संघर्ष करता रहेगा।
