वाराणसी। श्रीविद्यामठ, केदारघाट, वाराणसी में गुरुवार को आयोजित पत्रकार वार्ता में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दिए गए 40 दिनों के अल्टीमेटम के 21वें दिन सरकार की नीतियों और कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि बीते 20 दिनों में मुख्यमंत्री की ओर से स्वयं को “असली हिन्दू” सिद्ध करने संबंधी कोई ठोस संकेत नहीं मिले हैं।
संत समाज से शास्त्रसम्मत स्पष्टीकरण की मांग
शंकराचार्य ने कहा कि किसी विरक्त संत या महंत का धर्मनिरपेक्ष पद पर पूर्णकालिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में कार्य करना सन्यास की मर्यादा के प्रतिकूल है। उन्होंने समस्त अखाड़ों, महामंडलेश्वरों और महंतों से आह्वान किया कि वे शास्त्रसम्मत तर्कों के आधार पर इस विषय पर अपनी स्थिति स्पष्ट करें। उनका कहना था कि यदि ऐसे कृत्य शास्त्र सम्मत सिद्ध नहीं किए जा सकते, तो उन्हें ढोंग की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
गोरक्षा के मुद्दे पर सरकार की चुप्पी पर सवाल
महाराज ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने प्रतीकात्मक कदम उठाए हैं, जैसे फिल्म ‘गोदान’ को टैक्स-फ्री करना, परंतु उनकी मुख्य मांगों—गाय को “राज्य माता” घोषित करने और गोमांस निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध—पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि मनोरंजन को कर-मुक्त करने से गोवंश की रक्षा सुनिश्चित नहीं होगी और सरकार को संवैधानिक स्तर पर ठोस पहल करनी चाहिए।
पशुगणना के आंकड़ों का हवाला
शंकराचार्य ने भारत सरकार की 20वीं पशुगणना के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में गोवंश की संख्या में 15.18 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि उत्तर प्रदेश में 3.93 प्रतिशत की कमी आई है। उन्होंने दावा किया कि उत्तर प्रदेश की गंगातीरी, केनकथा, खैरगढ़ और मेवाती जैसी देशी नस्लें विलुप्ति के कगार पर हैं।
मांस निर्यात और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ पर टिप्पणी
उन्होंने आरोप लगाया कि ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की आड़ में उत्तर प्रदेश देश का प्रमुख मांस निर्यातक राज्य बन गया है और भारत के कुल मांस निर्यात में प्रदेश की हिस्सेदारी 43 प्रतिशत से अधिक है। उनके अनुसार, यह स्थिति सरकार की प्राथमिकताओं पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
सदन में बयानबाजी पर आपत्ति
शंकराचार्य ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री गोरक्षा के मुद्दे पर मौन हैं, जबकि उनके शंकराचार्य पद की प्रामाणिकता पर सार्वजनिक रूप से प्रश्न उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि धर्मपीठ की मान्यता किसी राजकीय प्रमाणपत्र पर निर्भर नहीं करती।
उपमुख्यमंत्रियों के प्रयासों का उल्लेख
अपने वक्तव्य में उन्होंने यह भी कहा कि पिछले 20 दिनों के दौरान राज्य के उपमुख्यमंत्रियों और कुछ भाजपा नेताओं ने पार्टी की प्रतिष्ठा बनाए रखने का प्रयास किया, किंतु मुख्य मुद्दों पर कोई स्पष्ट घोषणा सामने नहीं आई।
शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि 21वें दिन से यह आंदोलन एक नए और निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है। उन्होंने संकेत दिया कि यदि निर्धारित अवधि में उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो आगे की रणनीति की घोषणा की जाएगी।
