नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) देश में पॉलिमर यानी प्लास्टिक आधारित नोटों को पेश करने की संभावना पर गंभीरता से विचार कर रहा है। हाल ही में पटना और मुंबई में आयोजित केंद्रीय बैंक की बोर्ड बैठकों में इस प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा हुई है, जिससे संकेत मिलते हैं कि जल्द ही इस दिशा में पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जा सकता है।
नोट छपाई की बढ़ती लागत बनी कारण
आरबीआई की वित्त वर्ष 2025 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, कागजी नोटों की छपाई पर 6,372.80 करोड़ रुपये का खर्च आया, जो पिछले वर्ष के 5,101.40 करोड़ रुपये की तुलना में काफी अधिक है। बढ़ती नकदी मांग को इस वृद्धि का प्रमुख कारण बताया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्लास्टिक (पॉलिमर) नोट लंबे समय तक चलने के कारण अधिक किफायती साबित हो सकते हैं, जिससे बार-बार नोट छापने की जरूरत और लागत दोनों कम हो सकती हैं।
खराब और फटे नोटों की चुनौती
देश में चलन से बाहर किए गए खराब नोटों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2025 में लगभग 23.80 अरब खराब नोट सिस्टम से हटाए गए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12.3 प्रतिशत अधिक है। इनमें सबसे अधिक हिस्सेदारी 500 रुपये के नोटों की रही, इसके बाद 100 रुपये के नोट शामिल रहे।
डिजिटल भुगतान के बढ़ने के बावजूद देश में नकदी का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। 15 मई तक प्रचलन में मौजूद कुल मुद्रा (सीआईसी) 42 लाख 86 हजार करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई, जो सालाना आधार पर 11.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है।
छोटे नोटों और पुराने अनुभवों की भूमिका
10 और 20 रुपये जैसे छोटे नोटों की मांग अभी भी बनी हुई है, हालांकि कुल मुद्रा में इनकी हिस्सेदारी बहुत कम है। इससे पहले सिक्कों के उपयोग को बढ़ाने की कोशिशें भी की गई थीं, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
साल 2012 में पांच शहरों में 10 रुपये के पॉलिमर नोटों का फील्ड ट्रायल किया गया था, जिसमें लगभग 1 अरब नोट जारी किए गए थे। हालांकि तकनीकी और व्यावहारिक चुनौतियों के कारण यह प्रयोग आगे नहीं बढ़ पाया।
वैश्विक रुझान के अनुरूप कदम
दुनिया के लगभग 60 देश पहले ही पॉलिमर बैंक नोटों को अपना चुके हैं। इसकी शुरुआत 1988 में ऑस्ट्रेलिया ने की थी। इसके बाद सिंगापुर, थाईलैंड, मलेशिया और अन्य देशों ने भी इसे अपनाया। भारत में यह पहल सफल रहती है तो यह वैश्विक वित्तीय प्रणाली के अनुरूप एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।
आरबीआई का मानना है कि आधुनिक एटीएम और बैंकिंग तकनीक अब इन नोटों को पहचानने और प्रोसेस करने में सक्षम है, जिससे इनके संचालन में बड़ी बाधा नहीं रह जाएगी।
