मुंगेली। जनपद पंचायत पथरिया अंतर्गत ग्राम पंचायत अमोरा में अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित सरपंच पद पर कथित फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर चुनाव लड़ने का मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई में देरी को लेकर चर्चा में है। शिकायतकर्ता के अनुसार, मामले की जांच जिला स्तरीय समिति द्वारा किए जाने के बाद अपनी संस्तुति रिपोर्ट राज्य स्तरीय उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति को भेजे हुए तीन महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अब तक न तो समिति की बैठक होने की जानकारी सामने आई है और न ही किसी प्रकार की सुनवाई हुई है।

शिकायतकर्ता विजय खांडेकर का आरोप है कि इस मामले में शिकायत चुनाव प्रक्रिया के दौरान ही संबंधित रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष दर्ज कराई गई थी। ग्राम पंचायत अमोरा की सीट एससी वर्ग के लिए आरक्षित थी और याकूब मसीह (कुमार) ने एससी प्रमाण पत्र के आधार पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की। शिकायतकर्ता का कहना है कि चुनाव के दौरान साक्ष्य प्रस्तुत करने को कहा गया था, लेकिन प्रक्रिया में हुई देरी के बीच चुनाव परिणाम घोषित कर दिए गए और याकूब कुमार सरपंच निर्वाचित हो गए।
जिला स्तर से राज्य समिति को भेजा गया मामला
मामला सामने आने के बाद शिकायतकर्ता ने जिला प्रशासन सहित संबंधित विभागों में शिकायतें कीं। आदिवासी विकास विभाग के अधिकारी शिव बांधे के अनुसार, शिकायत के आधार पर जिला स्तरीय समिति ने मामले की प्रारंभिक जांच की थी। जाति संबंधी दावे के तकनीकी सत्यापन के लिए विस्तृत जांच आवश्यक होने के कारण प्रकरण को राज्य स्तरीय उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति को भेजा गया, जहां अंतिम निर्णय का अधिकार है।
बताया गया है कि तत्कालीन मुंगेली कलेक्टर कुन्दन कुमार ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच और नियमानुसार कार्रवाई की बात कही थी। उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
हालांकि, शिकायतकर्ता का कहना है कि जिला समिति की रिपोर्ट राज्य स्तरीय समिति तक पहुंचने के बावजूद अब तक मामले में सुनवाई आगे नहीं बढ़ी है। इससे शिकायतकर्ता और स्थानीय ग्रामीणों में नाराजगी है।
पिता पक्ष के बजाय ननिहाल के दस्तावेजों पर सवाल
मामले में बचाव के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों को लेकर भी शिकायतकर्ता ने कई सवाल उठाए हैं। शिकायतकर्ता के अनुसार, याकूब कुमार की ओर से अपनी जाति के समर्थन में माता पक्ष यानी ननिहाल से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत किए गए हैं।
इन दस्तावेजों में उनकी माता उषा बाघमारे, नाना तिमोथी बाघमारे और नानी कमोलिना, जिन्हें सतनामी जाति से संबंधित बताया गया है, के संबंध में ग्राम बरदुली की सरपंच सुष्मिता जाटवर द्वारा जारी पंचनामा प्रतिवेदन शामिल होने का दावा किया गया है।
शिकायतकर्ता ने प्रस्तुत वंशावली की प्रमाणिकता पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि वंश वृक्ष में कई नामों के साथ ‘उर्फ’ शब्द जोड़ा गया है, जबकि उनके द्वारा सक्षम कार्यालयों से प्राप्त आधिकारिक वंशावली में पूर्वजों के नाम के साथ इस प्रकार का उल्लेख नहीं है।
‘टंडन’ उपनाम से जुड़े दस्तावेजों पर भी आपत्ति
शिकायतकर्ता ने याकूब कुमार की ओर से प्रस्तुत किए गए ‘टंडन’ उपनाम से संबंधित दस्तावेजों पर भी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि अमोरा गांव में लंबे समय से किसी टंडन परिवार के निवासरत होने की जानकारी स्थानीय स्तर पर नहीं मिलती।
इसके साथ ही शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि जिन शासकीय कार्यालयों से उन्हें याकूब कुमार के विरुद्ध साक्ष्य प्राप्त हुए, उन्हीं कार्यालयों से बाद में उनके पक्ष में भी दस्तावेज जारी किए गए। इस आधार पर शिकायतकर्ता ने संबंधित दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच और प्रमाणिकता के सत्यापन की मांग की है।
धर्म और जाति संबंधी दावों की भी जांच की मांग
शिकायतकर्ता विजय खांडेकर का दावा है कि याकूब कुमार अथवा उनके पूर्वजों के संबंध में धर्मांतरण और जातिगत पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य जांच के दायरे में आने चाहिए। उनका आरोप है कि संबंधित परिवार की कई पीढ़ियां ईसाई समुदाय से जुड़ी रही हैं और इस संबंध में दस्तावेज जिला प्रशासन एवं जिला स्तरीय समिति के समक्ष पहले ही प्रस्तुत किए जा चुके हैं।
हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और अंतिम निष्कर्ष संबंधित सक्षम जांच एवं छानबीन समिति के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होंगे।
राज्य समिति की सुनवाई पर टिकी निगाहें
मामला एससी आरक्षित सीट से निर्वाचित सरपंच की जाति प्रमाण पत्र की वैधता से जुड़ा होने के कारण इसकी संवेदनशीलता और बढ़ जाती है। शिकायतकर्ता का कहना है कि लंबे समय तक कार्रवाई लंबित रहने से यदि प्रमाण पत्र गलत पाया जाता है तो आरक्षित वर्ग के संवैधानिक अधिकारों से जुड़े सवाल भी उठेंगे।
अब शिकायतकर्ता और ग्रामीणों की नजर राज्य स्तरीय उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति की आगामी कार्रवाई पर है। उनका कहना है कि समिति को मामले की जल्द सुनवाई कर दस्तावेजों और जातिगत दावे का निष्पक्ष सत्यापन करते हुए नियमानुसार अंतिम निर्णय लेना चाहिए।
