मुंगेली। छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों एक अद्भुत और जादुई चमत्कार देखने को मिल रहा है। इसे प्रशासनिक ‘टाइम ट्रैवल’ कहें या चुनावी मौसम का जादू, जहाँ सात साल पहले जिस रेल परियोजना की नींव रखी जा चुकी थी, उसे आज फिर से बिल्कुल ‘नई-नवेली’ सौगात बताकर पेश किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के मीडिया प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने सत्ता पक्ष मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, केंद्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू और राजनांदगांव के सांसद संतोष पाण्डेय की इस अनोखी कलाबाजी पर तीखा व्यंग्य बाण चलाया है।
मामला कटघोरा से डोंगरगढ़ रेल लाइन परियोजना का है, जिसकी शुरुआत कागज़ों में 26 सितंबर 2018 को और ज़मीन पर भी आज से ठीक सात साल पहले 6 अक्टूबर 2018 को ही हो चुकी थी। उस समय तत्कालीन रेल मंत्री पीयूष गोयल, तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और तत्कालीन सांसद,लखन लाल साहू,अभिषेक सिंह की गरिमामयी मौजूदगी में इसका धूमधाम से भूमिपूजन संपन्न हुआ था। लेकिन अब इतने सालों बाद उसी पुरानी योजना को नए लिफाफे में लपेटकर जनता के सामने परोसा जा रहा है।
बिलासपुर संसदीय क्षेत्र के सरगांव में तो स्थानीय सांसद व केंद्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू ने तो अद्वितीय चमत्कार कर दिखाया,जिस मंजूरी के लिए 2018 में तत्कालीन सांसद लखन लाल साहू का भव्य स्वागत किया जा चुका है,उसी मंजूरी को नया बताकर अपना अद्भुत स्वागत का इंतजाम भी कर लिये, और पार्टी कार्यकर्ता व समर्थकों ने भी जनता को बेवकूफ बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी सरगांव में हजारों की संख्या में एकत्रित होकर स्वागत जुलूस निकालकर भव्य स्वागत किया गया जिसे विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों ने भी प्रमुखता से प्रकाशित किया।
कांग्रेस संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने तंज कसते हुए कहा कि जब सात साल पहले ही नारियल फूट चुका था, तो क्या अब उसी पुराने नारियल के पानी से नई क्रेडिट की फसल काटने की कोशिश की जा रही है? उन्होंने सवाल उठाया कि जब परियोजना का शिलान्यास 2018 में ही हो गया था, तो अब फिर से केंद्रीय रेल मंत्री से मिलकर इसे “नई स्वीकृति” का रंग क्यों चढ़ाया जा रहा है। ऐसा लगता है जैसे नेता जी यह मानकर चल रहे हैं कि जनता की याददाश्त बहुत कमज़ोर होती है और वह हर पाँच-सात साल में पुरानी घोषणाओं को भूल जाती है।
हास्यास्पद स्थिति तो यह है कि जिस योजना पर पिछले सात सालों में एक ईंट तक नहीं हिली, उसके लिए प्रधानमंत्री और रेल मंत्री को दोबारा धन्यवाद देने की होड़ मची हुई है। अगर व्यंग्यात्मक लहजे में देखा जाए तो कटघोरा-डोंगरगढ़ रेल लाइन भारतीय रेलवे के इतिहास की सबसे अनोखी परियोजना बन चुकी है। साल 2018 में इसका ज़मीन पर भूमिपूजन हुआ, उसके बाद अगले सात सालों तक यह केवल कागज़ों पर दौड़ती रही, और अब एक बार फिर “नई मंजूरी” का ढोल पीटकर सस्ती लोकप्रियता बटोरने का प्रयास किया जा रहा है।
कांग्रेस मीडिया प्रमुख ने सत्ता पक्ष को सीधे आड़े हाथों लेते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ की समझदार जनता को बेवकूफ बनाना अब बंद होना चाहिए। अगर सरकार में ज़रा भी नैतिक साहस है तो नेता जी को जनता को यह बताना चाहिए कि बीते सात सालों में इस परियोजना का काम क्यों ठप पड़ा रहा, न कि बंद पड़ी पुरानी योजना की री-पैकेजिंग करके अपनी पीठ थपथपानी चाहिए। कुल मिलाकर, राज्य की राजनीति में अब नया नियम बनता दिख रहा है कि काम चाहे एक इंच न बढ़े, लेकिन हर पाँच साल में शिलान्यास और क्रेडिट का उत्सव मनाना बेहद ज़रूरी है।
