नई दिल्ली। अक्टूबर के महीने में सुबह-शाम की सुहानी ठंड ने लोगों को भले ही राहत दी हो, लेकिन आगामी सर्दियों का मौसम सामान्य नहीं रहने वाला है। भारतीय मौसम विज्ञान सोसाइटी के विशेष सम्मेलन में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का असामान्य रूप से गर्म होना यानी अल नीनो वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित कर रहा है।
इस मौसमी बदलाव के कारण भारत के विशाल मैदानी और मध्य भागों में सर्दियों का असर हल्का रह सकता है और फरवरी के महीने से ही समय से पहले गर्मी अपने तीखे तेवर दिखाना शुरू कर सकती है।
उत्तर और मध्य भारत में सामान्य से 1 से 2 डिग्री अधिक रहेगा तापमान
भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER), मोहाली के पृथ्वी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के मौसम विशेषज्ञ डॉ. राजू अट्टादा द्वारा प्रस्तुत क्लाइमेट मॉडल के अनुसार, दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 के दौरान उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में तापमान सामान्य से ऊपर रहने की 70 फीसदी तक संभावना है। विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिकतम और न्यूनतम दोनों तापमान औसत से 1 से 2 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किए जा सकते हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि शीतलहर नहीं चलेगी, लेकिन पश्चिमी विक्षोभ की सक्रियता और स्थानीय कारकों के आधार पर कड़ाके की ठिठुरन वाले दिनों की कुल संख्या सीमित रह सकती है।
गेहूं, सरसों और दलहन की फसलों पर सीधा खतरा
सर्दियों में तापमान में असामान्य बढ़ोतरी का सबसे बड़ा नुकसान देश के कृषि क्षेत्र को उठाना पड़ सकता है। रबी सीजन में बोई जाने वाली फसलों, विशेष रूप से गेहूं, सरसों, चना और अन्य दलहनों को बेहतर वानस्पतिक विकास, कल्ले फूटने और दाना भरने के लिए लंबे समय तक अनुकूल ठंडक और समय-समय पर हल्की बारिश की दरकार होती है।
यदि दिसंबर और जनवरी के दौरान रातें गर्म रहीं और फरवरी में अचानक तापमान बढ़ा, तो गेहूं की फसल समय से पहले पकने की ओर बढ़ सकती है, जिससे दाना छोटा और हल्का रह जाएगा और कुल कृषि उत्पादन में बड़ी गिरावट आ सकती है।
जलाशयों में पानी की कमी से सिंचाई संकट गहराने की आशंका
गर्म मौसम और बारिश की कमी के बीच देश के जल संसाधनों पर भी दबाव बढ़ रहा है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में उपलब्ध जल भंडारण उनकी कुल क्षमता का करीब 70 प्रतिशत ही है, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 10 फीसदी कम है।
यदि सर्दियों के दौरान बारिश नहीं हुई और तापमान बढ़ा, तो रबी फसलों की सिंचाई के लिए नहरों और भूजल पर निर्भरता अचानक बढ़ जाएगी, जिससे आने वाले महीनों में जल प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।
क्या है अल नीनो और भारत पर कैसे डालता है असर?
अल नीनो एक प्रमुख प्राकृतिक मौसमी घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की समुद्री सतह का तापमान सामान्य से 0.5 से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक गर्म हो जाता है। यह वार्मिंग समुद्री हवाओं और बादलों के सामान्य पैटर्न को उलट देती है।
हालांकि भारत में अल नीनो का सबसे चर्चित संबंध कमजोर मानसूनी बारिश से रहा है, लेकिन वैज्ञानिक शोधों से स्पष्ट हुआ है कि इसका असर सर्दियों के दौरान जेट स्ट्रीम और पछुआ पवनों की स्थिति को बदलकर सर्दी की तीव्रता को कम करने और शुष्क मौसम को बढ़ावा देने में भी होता है।
फरवरी से ही तेज गर्मी की आशंका, किसानों के लिए तैयारी जरूरी
मौसम वैज्ञानिकों का आकलन है कि यदि प्रशांत महासागर में यह गर्मी बनी रही, तो फरवरी 2027 के शुरुआती पखवाड़े से ही देश के कई हिस्सों में समय से पहले गर्मी का अहसास तेज होने लगेगा।
कृषि विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि किसानों को तापमान के प्रति संवेदनशील फसलों की बुवाई के समय का चयन सावधानी से करना चाहिए और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा विकसित गर्मी-रोधी बीजों की किस्मों को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि जलवायु के इस अप्रत्याशित झटके से पैदावार को बचाया जा सके।
