बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 19 वर्ष पुराने रिश्वत प्रकरण में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए विशेष न्यायालय द्वारा तत्कालीन पटवारी रेखराम पाटनवार (दिवंगत) और उनके पुत्र योगेंद्र कुमार पाटनवार को दी गई दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग साबित करने में विफल रहा, जबकि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषसिद्धि के लिए रिश्वत मांगे जाने का स्पष्ट प्रमाण आवश्यक है।
मामले के अनुसार वर्ष 2003 में शिकायतकर्ता ने लोकायुक्त में शिकायत दर्ज कराई थी कि भूमि के राजस्व अभिलेखों में नामांतरण करने के एवज में तत्कालीन पटवारी रेखराम पाटनवार ने 3,500 रुपये रिश्वत की मांग की थी। ट्रैप कार्रवाई के बाद विशेष न्यायालय ने वर्ष 2006 में पटवारी और उनके पुत्र को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।
अपील की सुनवाई के दौरान रेखराम पाटनवार का निधन हो गया, जिसके बाद उनके विधिक प्रतिनिधियों ने मामले की पैरवी जारी रखी। न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल की एकलपीठ ने शिकायतकर्ता की गवाही, बातचीत के ट्रांसक्रिप्ट और अन्य साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि रिश्वत मांगे जाने का आरोप विश्वसनीय रूप से सिद्ध नहीं हुआ।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल रिश्वत की राशि की बरामदगी या कथित लेन-देन, रिश्वत की मांग सिद्ध किए बिना दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के बी. जयराज बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-7 के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए रिश्वत की मांग का प्रमाण अनिवार्य है।
इन आधारों पर हाईकोर्ट ने विशेष न्यायालय का 25 अप्रैल 2006 का फैसला रद्द करते हुए दिवंगत पटवारी रेखराम पाटनवार और उनके पुत्र योगेंद्र कुमार पाटनवार को सभी आरोपों से बरी कर दिया। यह फैसला लगभग दो दशक पुराने मामले में आरोपियों के पक्ष में बड़ी राहत माना जा रहा है।
