धमतरी। छत्तीसगढ़ में पड़ रही भीषण गर्मी और जल संकट के बीच उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व से वन्यजीव संरक्षण की दो महत्वपूर्ण और सकारात्मक खबरें सामने आई हैं। एक ओर वन विभाग द्वारा जंगलों के भीतर तैयार किए गए पारंपरिक जल स्रोत (झिरिया) वन्यजीवों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रहे हैं, तो दूसरी ओर विभाग की सतर्कता ने जल स्रोतों में जहर मिलाकर वन्यजीवों के सामूहिक शिकार की एक बड़ी साजिश को समय रहते विफल कर दिया है।
रिजर्व के कुल्हाड़ीघाट परिक्षेत्र में हाल ही में एक हृदयस्पर्शी दृश्य देखने को मिला, जहां हाथियों का एक कुनबा अपने नन्हे शावकों के साथ कृत्रिम झिरिया में पानी पीते और जलक्रीड़ा करते नजर आया। जंगल के बीचोंबीच कैद हुआ यह दृश्य न केवल वन विभाग के प्रयासों की सफलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि समय रहते किए गए जल संरक्षण कार्य वन्यजीवों के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं।
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के डीएफओ वरुण जैन ने बताया कि मौसम विशेषज्ञों द्वारा इस वर्ष सुपर एल-नीनो के प्रभाव के चलते भीषण गर्मी और सूखे की आशंका जताई गई थी। ऐसे में वन्यजीवों को पानी की तलाश में जंगल छोड़कर गांवों और आबादी वाले क्षेत्रों की ओर जाने से रोकने के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार की गई। इसके तहत जंगल के विभिन्न हिस्सों में 800 से अधिक पारंपरिक झिरियाओं का निर्माण कराया गया। इन जल स्रोतों को रेतीली परतों की खुदाई कर भूमिगत जल संवर्धन तकनीक के माध्यम से विकसित किया गया है। साथ ही 34 सोलर पंप भी लगाए गए हैं, जिससे गर्मी के दिनों में भी वन्यजीवों को पर्याप्त पानी उपलब्ध हो सके।
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वन विभाग के अनुसार, इन प्रयासों का सकारात्मक परिणाम अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। हाथियों सहित अन्य वन्यजीव नियमित रूप से इन जल स्रोतों का उपयोग कर रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावनाएं भी कम हुई हैं।
इसी बीच वन विभाग की एंटी-पोचिंग टीम ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए ओडिशा सीमा से लगे कटफाड़, कुसुमखुंटा और खिपरीमाल क्षेत्र के सात अंतरराज्यीय शिकारियों को गिरफ्तार किया है। प्रारंभिक जांच में खुलासा हुआ है कि आरोपी जंगल के जल स्रोतों में जहरीला पदार्थ मिलाकर हाथियों, बाघों तथा अन्य वन्यजीवों का सामूहिक शिकार करने की योजना बना रहे थे। यदि यह साजिश सफल हो जाती तो रिजर्व क्षेत्र में बड़ी संख्या में वन्यजीवों की मौत हो सकती थी। हालांकि वन विभाग की सतर्क निगरानी और त्वरित कार्रवाई से इस गंभीर खतरे को समय रहते टाल दिया गया।
उल्लेखनीय है कि उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के आसपास लगभग 100 ग्रामीण बस्तियां स्थित हैं। ऐसे में वन विभाग आधुनिक तकनीक का भी सहारा ले रहा है। सैटेलाइट ट्रैकिंग, अर्ली वार्निंग सिस्टम और फील्ड स्टाफ की मदद से हाथियों की गतिविधियों की लगातार निगरानी की जा रही है। हाथियों के गांवों की ओर बढ़ने की स्थिति में ग्रामीणों को पहले ही सूचना देकर सतर्क किया जाता है, जिससे जान-माल की हानि को रोका जा सके।
भीषण गर्मी के इस दौर में जंगल के भीतर बनाए गए ये जल स्रोत वन्यजीवों के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं। एक तरफ जहां ये झिरियाएं बेजुबान जीवों की प्यास बुझाकर उनके जीवन की रक्षा कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर वन विभाग की सक्रियता वन्यजीव संरक्षण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को भी मजबूती से रेखांकित कर रही है। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व का यह मॉडल अब वन्यजीव संरक्षण और जल प्रबंधन के क्षेत्र में एक प्रेरणादायी उदाहरण बनकर उभर रहा है।
