दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर बढ़ती पर्वतारोहण गतिविधियों के बीच हिमालयी पर्यावरण पर मानव अपशिष्ट का दबाव चिंता का विषय बनता जा रहा है। एवरेस्ट के बेस कैंप और उससे ऊपर स्थित शिविरों में पर्वतारोहियों, गाइडों और अन्य कर्मचारियों द्वारा छोड़े जा रहे मूत्र और अन्य अपशिष्ट के कारण बर्फ और ग्लेशियरों के प्रदूषण का खतरा बढ़ रहा है।
वैज्ञानिक रूप से यह माना जाता है कि पेशाब में मौजूद यूरिया और विभिन्न घुले हुए लवण पानी के हिमांक को कम कर सकते हैं। हालांकि, खुले ग्लेशियर पर इसका वास्तविक स्तर पर कितना प्रभाव पड़ता है, यह स्थानीय परिस्थितियों और अन्य पर्यावरणीय कारकों पर निर्भर करता है। ऐसे में ग्लेशियरों के बड़े पैमाने पर पिघलने का प्रमुख कारण केवल मानव मूत्र को मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।
बर्फ की गुणवत्ता और पर्यावरण पर असर
ऊंचाई वाले कैंपों में लंबे समय तक रहने वाले पर्वतारोहियों की संख्या बढ़ने के साथ मानव अपशिष्ट के उचित निस्तारण की चुनौती भी बढ़ी है। बर्फ में जमा मूत्र और अन्य अपशिष्ट गर्म मौसम में पिघलने वाले पानी के साथ नीचे की ओर पहुंच सकते हैं।
इसके अलावा, बर्फ पर जमा अशुद्धियां उसकी सतह की विशेषताओं को बदल सकती हैं। गहरे रंग या धूल जैसे पदार्थ बर्फ की सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करने की क्षमता यानी अल्बेडो को प्रभावित कर सकते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया पर असर पड़ने की संभावना रहती है।
पेयजल स्रोतों पर भी चिंता
एवरेस्ट क्षेत्र में ग्लेशियर और बर्फ पिघलने से मिलने वाला पानी स्थानीय समुदायों के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए मानव मल-मूत्र और अन्य कचरे के कारण जलस्रोतों के प्रदूषण की आशंका पर्यावरण के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से भी गंभीर है।
विशेषज्ञों के लिए चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि पर्वतारोहण गतिविधियों से उत्पन्न अपशिष्ट ग्लेशियरों और जलस्रोतों में न पहुंचे। इसके लिए ऊंचाई वाले कैंपों में बेहतर अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था की जरूरत बताई जा रही है।
मानव अपशिष्ट वापस लाने पर जोर
एवरेस्ट पर स्वच्छता व्यवस्था को मजबूत करने के लिए पर्वतारोहियों से मानव अपशिष्ट को निर्धारित कंटेनर या बैग में जमा कर नीचे लाने पर जोर दिया जा रहा है। इस व्यवस्था का उद्देश्य ग्लेशियर क्षेत्र में मल-मूत्र के खुले में छोड़े जाने को रोकना और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करना है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि एवरेस्ट पर जलवायु परिवर्तन पहले से ही ग्लेशियरों के लिए बड़ा खतरा है। ऐसे में पर्यटन और पर्वतारोहण से पैदा होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना जरूरी है, ताकि मानवीय गतिविधियों से इस संवेदनशील क्षेत्र पर अतिरिक्त दबाव न पड़े।
