मुंगेली। कहते हैं सरकारी खजाना सुरक्षित हाथों में होता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के मुंगेली में तो खजाना ही ‘हाथों की सफाई’ का शिकार हो गया। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की मुंगेली शाखा में एक बैंक कर्मी ने अधिकारियों की आईडी के साथ ऐसा ‘डिजिटल जादू’ किया कि 26.87 लाख रुपये सरकारी खाते से फुर्र हो गए। बैंक ने अपनी गलती मानकर राशि तो वापस कर दी, लेकिन अब इस खेल में जो ‘कानूनी लुका-छिपी’ चल रही है, वह किसी सस्पेंस फिल्म से कम नहीं है।
आरोपी बैंक कर्मचारी को निलंबित कर खानापूर्ति तो कर दी गई, लेकिन सवाल यह है कि जनता के टैक्स के पैसों की हेरा-फेरी क्या सिर्फ ‘पैसे वापस करने’ से माफ हो जाती है? घटना के तीन महीने बीत चुके हैं, एफआईआर के नाम पर कलेक्ट्रेट और थाना आमने-सामने खड़े हैं, और आरोपी खुलेआम घूम रहा है।
अपर कलेक्टर जीएल यादव का दावा है कि उन्होंने 13 मार्च को ही थाने में आवेदन दे दिया था, लेकिन पुलिस है कि फाइल दबाए बैठी है। अपर कलेक्टर साहब का तर्क है— “हमने आवेदन दिया है, अब पुलिस अपनी जांच करे, बैंक से जवाब मांगे और एफआईआर दर्ज करे।”
दूसरी तरफ, थाना प्रभारी कार्तिकेश्वर जांगड़े का अपना ही ‘प्रोटोकॉल’ है। उनका कहना है कि पहले आंकड़े गलत थे,बार बार मांगने पर नए व सही दस्तावेजों उपलब्ध कराई गई। थाना प्रभारी का आरोप है कि जब पुलिस दस्तावेजों और बैंकिंग प्रक्रिया के बारे में जानकारी मांगती है, तो कलेक्ट्रेट की तरफ से पल्ला झाड़ते हुए कह दिया जाता है— “फलां जगह से पता कर लो, हमने आवेदन दे दिया है।”
ऐसा लगता है मानो दोनों पक्ष ‘जिम्मेदारी का हॉट पोटैटो’ खेल रहे हैं—एक के हाथ से दूसरे के हाथ में, ताकि किसी को भी कार्रवाई का जिम्मा न लेना पड़े।
जबकि जिला कलेक्टर कुन्दन कुमार ने बीते महीने मीडिया के सामने स्पष्ट किया था कि इस मामले पर कुछ दिनों में एफआईआर दर्ज करा ली जाएगी और दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। कलेक्टर ने इस ढीले-ढाले रवैए पर ट्रू सोल्जर को बताया कि मैं एक बार अवलोकन कर लेता हूं व आश्वास्त करता हूं कि जल्द एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
यह मामला सिर्फ 26.87 लाख रुपये की हेरा-फेरी का नहीं है, बल्कि उस तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाता है जो खुद को ‘प्रशासनिक रूप से सतर्क’ बताता है। कलेक्टर साहब का मीडिया के सामने दिया गया वह बयान कि “जल्द एफआईआर दर्ज होगी”, अब तीन महीने बाद एक मजाक की तरह महसूस हो रहा है।
क्या कानून सिर्फ आम आदमी के लिए है? सरकारी धन की सुरक्षा के साथ हुई इस छेड़छाड़ पर प्रशासनिक ढुलमुल रवैया यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर किसकी शह पर मामले को ठंडे बस्ते में डाला जा रहा है?
अगर बैंक ने पैसा वापस कर दिया है,तो क्या प्रशासन ने ‘अपराध’ को भी वापस ले लिया है? क्या एफआईआर के लिए अब किसी और ‘आईडी’ या ‘जादू’ की जरूरत है? फिलहाल, मुंगेली की इस फाइलों वाली जंग में सरकारी तंत्र अपनी साख खो रहा है और आरोपी कानून की आड़ में मुस्कुरा रहा है।
दोनों ही पक्ष अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से भागते हुए प्रतीत हो रहे हैं। ऐसे में एक निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच ACB द्वारा ही इस ‘मैत्रीपूर्ण ढिलाई’ को तोड़ सकती है।
सरकारी खजाने की सुरक्षा से खिलवाड़ महज एक ‘वित्तीय त्रुटि’ नहीं, बल्कि एक गंभीर अपराध है। बैंक द्वारा पैसा लौटा देने भर से ‘अपराध की गंभीरता’ कम नहीं हो जाती। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह आने वाले समय में अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए एक गलत उदाहरण बन सकता है।
