जगदलपुर। बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी के मंदिर प्रांगण में बुधवार, 12 अगस्त को हरेली अमावस्या के पावन अवसर पर पाट जात्रा पूजा विधान के साथ विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व का शुभारंभ होगा। करीब 75 दिनों तक चलने वाले इस ऐतिहासिक पर्व के दौरान बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और सदियों पुरानी लोक परंपराओं के अनुरूप विभिन्न रस्में निभाई जाएंगी। पाट जात्रा पूजा विधान के दौरान पारंपरिक मांझी-चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन, पुजारी, पटेल, नाईक-पाईक और सेवादार रथ निर्माण के लिए आवश्यक औजार तैयार करने की ‘ठुरलू खोटला’ रस्म निभाएंगे। बस्तर दशहरा समिति ने सभी सेवादारों, ग्रामीणों और गणमान्य नागरिकों से इस महत्वपूर्ण पूजा विधान में शामिल होने का आग्रह किया है।
12 अगस्त से 27 अक्टूबर तक चलेंगे प्रमुख आयोजन
बस्तर दशहरा के मुख्य कार्यक्रम के अनुसार 12 अगस्त को पाट जात्रा पूजा विधान के साथ पर्व का शुभारंभ होगा। इसके बाद 24 सितंबर को डेरी गड़ाई पूजा विधान, 10 अक्टूबर को काछनगादी पूजा विधान, 11 अक्टूबर को कलश स्थापना और 12 अक्टूबर को जोगी बिठाई पूजा विधान आयोजित किया जाएगा। 13 से 18 अक्टूबर तक प्रतिदिन नवरात्रि पूजा और रथ परिक्रमा पूजा विधान होंगे। 18 अक्टूबर को सुबह 11 बजे बेल पूजा विधान, 19 अक्टूबर को महाअष्टमी पूजा विधान और निशा जात्रा पूजा विधान का आयोजन होगा। 20 अक्टूबर को कुंवारी पूजा विधान, जोगी उठाई पूजा विधान और मावली परघाव होगा। इसके अगले दिन 21 अक्टूबर को भीतर रैनी पूजा विधान एवं रथ परिक्रमा और 22 अक्टूबर को बाहर रैनी पूजा विधान एवं रथ परिक्रमा की रस्म निभाई जाएगी।
मुरिया दरबार में जुटेंगे जनप्रतिनिधि और ग्रामीण
23 अक्टूबर को सुबह काछन जात्रा पूजा विधान होगा। इसी दिन दोपहर में बस्तर की ऐतिहासिक परंपरा मुरिया दरबार का आयोजन किया जाएगा। 24 अक्टूबर को कुटुम्ब जात्रा पूजा विधान के साथ ग्राम्य देवी-देवताओं की विदाई होगी। इसके बाद 27 अक्टूबर को मावली माता की डोली की विदाई पूजा विधान के साथ 75 दिवसीय बस्तर दशहरा पर्व का औपचारिक समापन होगा।
दुनिया भर में प्रसिद्ध है बस्तर दशहरा
मां दंतेश्वरी को समर्पित बस्तर दशहरा देश के अन्य स्थानों पर मनाए जाने वाले दशहरा पर्व से अपनी परंपराओं और स्वरूप के कारण अलग पहचान रखता है। करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह पर्व अपनी अनूठी जनजातीय परंपराओं, लोक संस्कृति, पूजा विधानों और भव्य रस्मों के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। इस पर्व में बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों से ग्रामीण, पारंपरिक पदाधिकारी, सेवादार और श्रद्धालु शामिल होते हैं। पर्व की प्रत्येक रस्म में बस्तर की सामाजिक व्यवस्था, जनजातीय आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई देती है।
