नई दिल्ली। भारतीय रुपया गुरुवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 30 पैसे की गिरावट के साथ 95.94 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। इससे पहले बुधवार को भी रुपया 95.64 के रिकॉर्ड स्तर तक कमजोर हुआ था। लगातार हो रही गिरावट से मुद्रा बाजार में चिंता बढ़ गई है और निवेशकों में अस्थिरता का माहौल बना हुआ है।
साल 2026 की शुरुआत से ही रुपया दबाव में बना हुआ है। दिसंबर 2025 में पहली बार यह 90 के स्तर को पार कर गया था, जिसके बाद से इसमें लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां यदि बनी रहीं तो रुपया आगे चलकर 100 के स्तर को भी छू सकता है।
रुपये में गिरावट के मुख्य कारण
1. वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव
मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा होर्मुज जलमार्ग में आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी है। ऐसे हालात में निवेशक सुरक्षित संपत्ति के रूप में डॉलर की ओर रुख कर रहे हैं।
2. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें
भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड के 100 डॉलर से ऊपर बने रहने के कारण भारत का आयात बिल बढ़ रहा है, जिससे डॉलर की मांग में वृद्धि और रुपये पर दबाव देखा जा रहा है।
3. मजबूत होता अमेरिकी डॉलर
वैश्विक स्तर पर डॉलर इंडेक्स 99 के आसपास पहुंच गया है। डॉलर की यह मजबूती उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं, खासकर रुपये पर दबाव डाल रही है।
4. विदेशी निवेशकों की बिकवाली
भारतीय शेयर बाजार से विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार पूंजी निकाल रहे हैं। हाल के दिनों में हजारों करोड़ रुपये की बिकवाली दर्ज की गई है, जिससे डॉलर आउटफ्लो बढ़ा है और रुपया कमजोर हुआ है।
5. महंगाई और आर्थिक दबाव
ऊर्जा कीमतों में वृद्धि और थोक महंगाई के ऊंचे स्तर पर पहुंचने से आर्थिक स्थिरता पर असर पड़ा है, जिससे बाजार धारणा कमजोर हुई है।
आम जनता पर असर
रुपये की गिरावट का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
* पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की कीमतों में वृद्धि की आशंका
* मोबाइल, लैपटॉप और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आयातित सामान महंगे
* विदेश यात्रा और शिक्षा का खर्च बढ़ना
* रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी
वैश्विक तेल संकट का असर
रिपोर्टों के अनुसार ओपेक देशों का तेल उत्पादन पिछले दो दशकों में सबसे निचले स्तर पर है। वहीं होर्मुज जलमार्ग में किसी भी प्रकार की बाधा से वैश्विक सप्लाई प्रभावित हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का मानना है कि अगर स्थिति नहीं सुधरी तो तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं।
सरकार की प्रतिक्रिया
सरकार ने हाल ही में सोने-चांदी जैसे कीमती धातुओं के आयात पर शुल्क बढ़ाकर डॉलर के बहिर्वाह को नियंत्रित करने की कोशिश की है। साथ ही आयात पर निर्भरता कम करने और विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिर रखने पर भी जोर दिया जा रहा है।
मुद्रा की गिरावट क्या है?
किसी मुद्रा का डॉलर के मुकाबले कमजोर होना “मुद्रा अवमूल्यन” कहलाता है। यह मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा भंडार, आयात-निर्यात संतुलन और वैश्विक पूंजी प्रवाह पर निर्भर करता है।
