मुंगेली। जिले के लालपुर थाना क्षेत्र के ग्राम डिंडोरी (चीन) में 30 जून को एक सनसनीखेज और गंभीर घटना हुई जिसमें पुलिस और प्रशासन की लापरवाही को उजागर किया गया है। पीड़ित परदेशी पुरी की बबी में 200 से अधिक दुर्लभ और बहुमूल्य वस्तुओं के वृक्षों को गिराने का आरोप है, साथ ही उनकी पत्नी की स्थापित समाधि और शिलालेख को भी क्षतिग्रस्त करने का आरोप है।
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इस मामले में नेपाल के गांव पुरी, मीलाबाई, मोहनपुरी (भोपाल) और कोटा भारती (तख्तपुर) पर गंभीर आरोप लगे हैं। पीड़ित का कहना है कि इन लोगों ने न सिर्फ अपनी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया बल्कि धार्मिक भावनाओं को भी ठेस पहुंचाई। समाधि स्थल को इलेक्ट्रानिक इलेक्ट्रानिक से क्षतिग्रस्त करने का प्रयास किया गया।
शिकायत के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं
पीड़ित परदेशी पुरी और खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ने इस मामले की शिकायत लालपुर थाने के साथ-साथ जिला जनदर्शन में भी की थी, लेकिन 19 दिन बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई। इससे जुड़े एक शेयरधारक ने 3 जुलाई को एसपी कार्यालय के सामने आत्मदाह करने की कोशिश की, जिसके बाद थानेदार ने गोदाम में प्रवेश करने की अनुमति दे दी।
अर्थशास्त्र की सामान्य टिप्पणी
इस दौरान एसोसिएशन के महासचिव जोसेफ नवनीत पाटिल ने कहा कि “अगर बेजा व्यवसाय में समाधि बनाई है, तो पड़ोसी उसे तोड़ सकता है और इस पर कोई कार्रवाई नहीं होगी,” प्रशासन की ओर से गंभीर प्रश्न दिए गए हैं।
राजनीतिक संरक्षण और पुलिस की पूर्वनिर्धारित कार्रवाई का आरोप
पीड़ित ने आरोप लगाया कि जब भी नेपाल पुरी पुरी द्वारा याचिका दायर की जाती है, तो पुलिस तत्परता से एक निष्पक्ष कार्रवाई करती है। यहां तक कि मंच के प्रभारी ने कथित तौर पर कहा कि “नेपाल पुरी सेंट्रल रेजिडेंट के घर के पुजारी हैं, ऊपर से दबाव होता है, हम भी कुछ नहीं कर सकते।”
जबकि पूर्व नेपाल में पुरी के खिलाफ कई अपराधी जेल गए थे, फिर भी उन पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की गई। इसके उलट, कट्टरपंथियों के खिलाफ़ अल्पसंख्यकों और रिश्वतखोरों के बल पर कार्रवाई के आरोप भी लगे हैं।
जनता का विश्वासपात्र और प्रश्न खड़ा करता है तंत्र
इस पूरी घटना में न केवल स्थानीय पुलिस की बर्खास्तगी पर सवाल उठाए गए हैं, बल्कि शासन-प्रशासन की सलाह और सलाह पर भी गहरा असर डाला गया है। जब धार्मिक स्थलों के साथ पशु हो जाते हैं, तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जाता है और पुलिस पर राजनीतिक दबाव डाला जाता है, ताकि संरक्षण दिया जा सके – तो आम नागरिकों की व्यवस्था पर से विश्वास उठना स्वाभाविक है।
अब यह देखने को मिलेगा कि क्या शासन इस गंभीर प्रकरण पर कोई वैज्ञानिक जांच कर दोषारोपण का प्रयास करेगा, या फिर इस मामले को अन्य मामलों की तरह दबा दिया जाएगा।
