बीजापुर। मकर संक्रांति केवल आनंद और पतंगबाजी का पर्व नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि जुड़ी हुई है। प्राचीन काल से मनाया जा रहा यह त्योहार सूर्य की उत्तरायण यात्रा की शुरुआत का संकेत देता है, जब सूर्य धनु से मकर राशि में प्रवेश करता है। इसे ऋतु परिवर्तन, नए चक्र की शुरुआत और उजाले की बढ़ोतरी का उत्सव माना जाता है।
वैदिक ग्रंथों और पुराणों में मकर संक्रांति का विशेष उल्लेख मिलता है। सूर्योपासना से जुड़े इस पर्व को देवताओं का दिन (उत्तरायण) प्रारंभ होने का प्रतीक माना गया है। महाभारत के अनुसार भीष्म पितामह ने इसी काल की प्रतीक्षा करते हुए प्राण त्यागे थे, इसलिए इसे मोक्ष-दाता काल भी कहा गया है। माना जाता है कि इस अवधि में किए गए दान-पुण्य का विशेष फल प्राप्त होता है।
इस त्योहार की जड़ें कृषि परंपराओं में भी गहराई से जुड़ी हैं। यह समय रबी की फसल के तैयार होने और नई फसल के स्वागत का होता है। किसान सूर्यदेव का आभार व्यक्त कर समृद्धि की कामना करते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों से मनाया जाता है- दक्षिण भारत में पोंगल, असम में बिहू, पंजाब-हरियाणा में लोहड़ी, जबकि उत्तर भारत में खिचड़ी और संक्रांति के रूप में इसकी पहचान है।
इतिहासकारों के अनुसार तिल और गुड़ के उपयोग का भी अपना महत्व है। शीत ऋतु में स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ यह आपसी संबंधों में मिठास बढ़ाने का प्रतीक माना जाता है। “तिल-गुड़ घ्या, गोड गोड बोला” जैसे पारंपरिक संदेश सद्भाव और सामाजिक एकता का भाव मजबूत करते हैं।
समय के साथ पर्व का स्वरूप भले बदला हो, लेकिन मकर संक्रांति आज भी सूर्य उपासना, प्रकृति का सम्मान और कृषि जीवन के उत्सव के रूप में समाज को जोड़ती रही है। परंपराओं और आस्था के इस संगम ने इसे भारतीय संस्कृति के सबसे प्राचीन और जीवंत त्योहारों में शामिल कर दिया है।
