बीजापुर। आदिवासी समाज की परम आराध्य देवीयों माता सम्मक्का–सरलम्मा के दर्शन के लिए हर दो वर्ष में तेलंगाना के मुलुगु जिले के ताड़वाया मंडल में स्थित मेडारम की पावन भूमि पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। दक्षिण भारत के ‘कुंभमेले’ के रूप में विख्यात तथा एशिया की सबसे बड़ी आदिवासी धार्मिक जात्रा कहा जाने वाली मेडारम महाजात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, बलिदान और आदिवासी अस्मिता का विराट उत्सव है।
आगामी 28 से 31 जनवरी के बीच मेडारम एक बार फिर करोड़ों श्रद्धालुओं की भक्ति से सराबोर नजर आएगा। घने जंगलों की गोद में, पहाड़ों और प्रकृति की साक्षी में आयोजित यह महाजात्रा आदिवासी समाज की अटूट श्रद्धा और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है।
मेडारम जात्रा की सबसे अनोखी पहचान यह है कि श्रद्धालु यहां पर किसी भव्य मंदिर या आडंबर के बिना खुले छत के नीचे भक्तिमय वातावरण में देवी के दर्शन करते हैं। आदिवासी समाज के लिए सम्मक्का–सरलम्मा केवल देवी नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वाली मातृशक्ति का प्रतीक हैं। इसी कारण इस जात्रा को धार्मिकता के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और भावनात्मक महत्व भी प्राप्त है।
देश के विभिन्न हिस्सों से उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
प्रदेश के अलावा तेलंगाना, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, ओडिशा सहित मध्य भारत एवं दक्षिण भारत के अनेक हिस्सों से श्रद्धालु बड़ी श्रद्धा के साथ मेडारम पहुंचते हैं। छत्तीसगढ़ की सीमावर्ती ग्रामों से हजारों भक्त पैदल, वाहनों या समूहों में देवी के दर्शन हेतु निकलते हैं। व्रत, उपवास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ की जाने वाली यह यात्रा स्वयं में एक आध्यात्मिक अनुभव बन जाती है।
रात में आध्यात्मिक वातावरण, मुख्य दर्शन पर आस्था का सैलाब
आगामी 28 जनवरी से शुरू होने वाली इस जात्रा के दौरान, विशेषकर रात्रि समय में मेडारम का संपूर्ण क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठता है। जंगल में जलते दीपक, ढोल-नगाड़ों की गूंज, पारंपरिक मंत्रोच्चार और श्रद्धालुओं की शांत प्रतीक्षा वातावरण को दिव्य बना देती है। 29 जनवरी को सम्मक्का माता के आगमन से उत्साह चरम पर पहुंचता है, जबकि 30 जनवरी को मुख्य दर्शन के दिन आस्था का महासागर सचमुच उमड़ पड़ता है।
इस जात्रा के दौरान 28 जनवरी को शाम 5 बजे माता सारलम्मा देवी सिंहासन पर आसीन होंगे।29 जनवरी को माता सम्मका देवी सिंहासन पर आसीन होंगे।30 जनवरी को देवताओं को आहुति अर्पित किया जाएगा।31 जनवरी को देवता जंगल में लौटेंगे। इस तरह से मेले का समापन होगा। इस दौरान करीब 2 करोड़ श्रद्धालु देवी देवताओं का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त करेंगे।
‘बंगारम्’ अर्पण: सादगी की परंपरा
मेडारम मेले में देवी को ‘बंगारम्’ (गुड़) अर्पित करने की परंपरा आदिवासी संस्कृति की सादगी और निश्छल भक्ति का प्रतीक है। यहां ऐश्वर्य या दिखावे से अधिक श्रद्धा को महत्व दिया जाता है। श्रद्धालु अपनी मन्नते पूरी होने पर अपने वजन के समान बंगारम (गुड) को तौलकर माताओं को चढ़ावा चढ़ाते है। जिसके बाद इससे प्रसाद कहा जाता है।
एशिया की सबसे बड़ी आदिवासी धार्मिक मेला
हर दो वर्ष में आयोजित होने वाली मेड़ारम महाजात्रा आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा और आत्मसम्मान का महोत्सव है। एशिया के सबसे बड़े आदिवासी कुंभ मेले जैसी पहचान बना चुकी यह मेला इस माह में एक बार फिर श्रद्धा और संस्कृति के अद्वितीय संगम के रूप में इतिहास की साक्षी बनेगी।
जम्पन्ना वागू: पवित्र स्नान का श्रद्धास्थल
मेड़ारम यात्रा के दौरान श्रद्धालु सबसे पहले जम्पन्ना वागू (नाला) में स्नान कर देवी दर्शन के लिए आगे बढ़ते हैं। लोक मान्यता के अनुसार यह स्थल वीर जम्पन्ना का प्रतीक है। माना जाता है कि यहां स्नान करने से पापों का नाश और मन की शुद्धि होती है। मेले के दौरान करोड़ों श्रद्धालु तड़के सुबह से यहां स्नान के लिए पहुंचते हैं। घने जंगलों से होकर बहने वाला यह पवित्र प्रवाह मेडारम मेले का आध्यात्मिक प्रारंभ बिंदु माना जाता है।
श्रद्धालु कभी बैलगाड़ी एवं पैदल चलकर इस मेले में पहुंचते थे। बस्तर के बीजापुर जिले के लोग पूर्व में इस मेले में जाने के लिए तड़के सुबह या फिर रात के समय गांवों से बैलगाड़ियों के काफिले के साथ पंक्तियों में गांवों से निकलते थे। जो बीजापुर जिले के तारलागुड़ा के गोदावरी नदी को नाव के सहारे पार कर अपनी यात्रा को आगे बढ़ाते थे। लोगों की माने तो यह यात्रा 3 दिनों की होती थी। इस दौरान श्रद्धालू रात होते ही गांवों या फिर नदी के किनारे पर अपना अस्थाई बसेरा बनाते थे। फिर सुबह होते ही काफिला निकल पड़ता था।मगर अब बदले हुए परिस्थितियों और सड़कों का निर्माण के चलते श्रद्धालु अब निजी वाहनों एवं किराए के वाहनों से इस मेले में पहुंचते है। जो यात्रा कभी तीन दिनो कि सफर कि होती थी वह आज महज चंद घंटों की हो गई है।
हजारों सुरक्षा कर्मी, दर्जनों अधिकारी एवं आधुनिक तकनीक के बलबूते इस महा आयोजन को सफलतापूर्वक आयोजित किया जाता है। बताया जाता है कि दर्जनों के तादाद में आईपीएस अधिकारी विशेष रणनीति, योजना बनाकर इसको सफल बनाते है। आयोजन से कुछ माह पूर्व से ही ट्रैफिक, स्वास्थ्य, पेयजल, सुरक्षा, यातायात को लेकर प्लानिंग बनाई जाती है। हालांकि यह आयोजन देखने में 4 दिनों की लगती है । मगर इससे सफलता के साथ आयोजित कराने में स्थानीय प्रशासन को खूब पसीना बहाना पड़ता है।
