मुंगेली। जनपद पंचायत मुंगेली में इन दिनों सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। यहाँ फाइलों पर धूल नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की परतें जमी हैं। आलम यह है कि कानून के रखवालों ने ही सूचना के अधिकार को ‘सूचना के निषेध’ में तब्दील कर दिया है।
आरटीआई कार्यकर्ता खेमेश्वर पुरी गोस्वामी का मामला इसका जीता-जागता प्रमाण है। करीब छह महीने पहले उनकी अपील पर सुनवाई पूरी हो चुकी है। नियमानुसार, सुनवाई के बाद आदेश का ‘जन्म’ हो जाना चाहिए था, लेकिन जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) के दफ्तर में यह फाइल किसी गुप्त कालकोठरी में कैद होकर रह गई है। लगता है, आदेश को ‘मोक्ष’ दिलाने के लिए किसी विशेष दक्षिणा का इंतजार किया जा रहा है।
आरटीआई कार्यकर्ता का कहना है कि जनपद पंचायत में जानकारी मांगने का मतलब है—अपनी जान आफत में डालना या फिर मोटी रकम का जुगाड़ करना। महीनों बीत जाने के बाद भी आदेश जारी न करना सीधे तौर पर संकेत देता है कि कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के बड़े कारनामों पर पर्दा डालने की कवायद चल रही है। जनता सवाल पूछती है, लेकिन दफ्तर के बाबू फाइलों पर ‘साइलेंस मोड’ लगा देते हैं।
सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 7 के तहत आवेदन मिलने के 30 दिनों के भीतर सूचना देना अनिवार्य है। लेकिन मुंगेली में शायद यह कानून ‘सजेस्टेड’ है, न कि ‘अनिवार्य’। छह महीने का समय बीत जाना, न केवल घोर लापरवाही है, बल्कि कानून का खुल्लम-खुल्ला उपहास है।
क्या कहता है कानून?
आरटीआई एक्ट की धारा 19(6) स्पष्ट करती है कि प्रथम अपीलीय अधिकारी को 30 दिनों के भीतर (विशेष परिस्थितियों में 45 दिन) अपील का निपटारा करना होता है। मुंगेली में इन नियमों का पालन करना शायद जनपद पंचायत के ‘वर्क कल्चर’ में नहीं है।
क्या सीईओ साहब के दफ्तर में कलम की स्याही खत्म हो गई है या फिर फाइलें ‘दबाने’ के लिए कोई विशेष ‘फ्रीजर’ मंगवाया गया है? आखिर खेमेश्वर पुरी गोस्वामी की फाइल को कौन सा अदृश्य हाथ रोक रहा है? यदि मुंगेली में कानून का राज है, तो फिर आरटीआई मरणासन्न अवस्था में क्यों है?
भ्रष्टाचार की इस मूक दास्तान का अंत कब होगा और क्या प्रशासन इस ‘आरटीआई विरोधी’ कुचक्र को तोड़ेगा? यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल मुंगेली में पारदर्शिता की लाश दफ्तर की दहलीज पर दम तोड़ रही है।
