कवर्धा। जिले के जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा में मनरेगा कार्यों के भुगतान को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि यहां पदस्थ मनरेगा प्रोग्रामर, जिन्हें वर्तमान में प्रभारी कार्यक्रम अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है, उनकी कार्यशैली से हितग्राही, निर्माण एजेंसियां, सरपंच और सचिव तक परेशान हैं। क्षेत्र में चर्चा जोरों पर है कि यहां भुगतान की प्रक्रिया नियम-कायदों से नहीं बल्कि “चढ़ावे” के आधार पर संचालित हो रही है। स्थानीय स्तर पर तंज कसा जा रहा है— “जिसने चढ़ावा चढ़ाया, उसी को प्रसाद मिला, बाकी को झुनझुना।”
विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मनरेगा अंतर्गत सामग्री भुगतान की एक निर्धारित प्रक्रिया है। किसी भी निर्माण कार्य— जैसे पशु शेड, कुआं निर्माण, भूमि सुधार, नाली निर्माण अथवा अन्य परिसंपत्ति निर्माण— के पूर्ण होने के बाद संबंधित निर्माण एजेंसी या हितग्राही द्वारा बिल-वाउचर कार्यालय में प्रस्तुत किया जाता है। इसके बाद तकनीकी सहायक, उप अभियंता अथवा संबंधित तकनीकी अधिकारी द्वारा स्थल निरीक्षण कर कार्य का मूल्यांकन एवं भौतिक सत्यापन किया जाता है। सत्यापन उपरांत माप पुस्तिका (Measurement Book) एवं अन्य दस्तावेजों के आधार पर भुगतान योग्य राशि निर्धारित होती है।
इसके बाद एम. आई. ऐस. पर बिल एंट्री कर कार्यों की प्राथमिकता सूची तैयार कर नियमानुसार भुगतान के लिए FTO (Fund Transfer Order) जनरेट किया जाता है। सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था यह कहती है कि जिन कार्यों का सत्यापन पहले पूर्ण हुआ हो, तथा एम.आई.एस. पर बिल एंट्री हुवा हो उनका भुगतान भी क्रमवार पहले होना चाहिए, ताकि किसी हितग्राही अथवा कार्य एजेंसी के साथ भेदभाव न हो। लेकिन सहसपुर लोहारा जनपद में यही प्रक्रिया सवालों के घेरे में दिखाई दे रही है।
आरोप है कि कई हितग्राही मूलक तथा सामुदायिक कार्य महीनों से पहले पूर्ण हो चुके हैं। पशु शेड निर्माण कराने वाले अनेक ग्रामीणों ने अपनी जेब से पैसा लगाकर निर्माण कार्य पूरा कराया। कुआं निर्माण जैसे कार्यों में मजदूरी के साथ सामग्री पर भारी खर्च किया गया। कई लोगों तथा कार्य एजेंसी ने कर्ज लेकर निर्माण पूरा किया, इस उम्मीद में कि शासन से समय पर भुगतान मिल जाएगा। लेकिन अब वही हितग्राही/कार्य एजेंसी कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि जिन कार्यों का सत्यापन एवं बिल एंट्री बाद में हुआ, उनका भुगतान पहले कर दिया गया। जबकि पुराने लंबित कार्यों को जानबूझकर रोके जाने की शिकायत सामने आ रही है। सूत्रों का दावा है कि भुगतान प्राथमिकता तय करने में पारदर्शिता नहीं बरती गई। कथित रूप से प्रभावशाली और रसूखदार लोगों के कार्यों का तेजी से भुगतान प्रक्रिया संपादन किया गया , जबकि सामान्य हितग्राहियों/कार्य एजेंसी/ व्यक्तियों की फाइलें लंबित रख दी गईं। जबकि नियमानुसार सबसे पहले मूल्यांकन , सत्यापन और बिल एंट्री हुए कार्यों का भुगतान के लिए पहले FTO बनाया जाता है साथ ही नियम यह भी है कि कम भुगतान राशि वाले कार्यों को तथा हितग्राहीमूलक कार्यों को भी भुगतान के लिए प्राथमिकता क्रम में ऊपर रखा जाना चाहिए। जबकि इसके विरुद्ध बड़े रसूखदार लोगों को फायदा पहुंचाने चढ़ावा लेकर उनके बड़े राशि का नया FTO बनाकर भुगतान किये जाने की शिकायत है!
इस पूरे मामले ने प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यदि भुगतान प्रक्रिया क्रमवार और नियमसम्मत होती, तो जिन हितग्राहियों/ कार्य एजेंसी के कार्य पहले पूर्ण हुए, उन्हें पहले भुगतान मिलना चाहिए था। लेकिन वर्तमान स्थिति यह संकेत दे रही है कि नियमों को दरकिनार कर चयनात्मक भुगतान किया गया। यही कारण है कि सरपंच, सचिव और निर्माण एजेंसियों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना का उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देना और जरूरतमंद परिवारों को आर्थिक सहारा देना है। लेकिन यदि भुगतान प्रक्रिया में ही भेदभाव और कथित लेन-देन हावी हो जाए, तो योजना की मूल भावना समाप्त हो जाती है। हितग्राहियों का आरोप है कि कार्यालय में स्पष्ट जवाब भी नहीं दिया जाता— सिर्फ आश्वासन देकर टाल दिया जाता है।
प्रभारी कार्यक्रम अधिकारी जिनका जनपद पंचायत बोड़ला में भी शिकायत होने पर उन्हें जनपद पंचायत स. लोहारा में पदस्थ कर प्रभारी कार्यक्रम अधिकारी का भी प्रभार दिया गया है पर यह भी सवाल उठ रहा है कि एक ही व्यक्ति द्वारा मनरेगा प्रोग्रामर और कार्यक्रम अधिकारी दोनों पदों का दायित्व निभाने से जवाबदेही कमजोर हो रही है। दो महत्वपूर्ण प्रशासनिक भूमिकाओं का केंद्रीकरण पारदर्शिता पर असर डाल सकता है। जब निर्णय, प्राथमिकता और भुगतान नियंत्रण एक ही स्तर पर केंद्रित हो जाए, तब मनमानी की आशंका स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है।
अब मांग उठ रही है कि जिला प्रशासन इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराए। लंबित भुगतान की सूची सार्वजनिक की जाए, भुगतान क्रम का रिकॉर्ड जांचा जाए तथा यह स्पष्ट किया जाए कि किन आधारों पर बाद में पूर्ण हुए कार्यों का भुगतान पहले किया गया। यदि जांच में पक्षपात, अनियमितता या भ्रष्टाचार प्रमाणित होता है, तो संबंधित अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई आवश्यक होगी।
फिलहाल सहसपुर लोहारा जनपद में मनरेगा भुगतान व्यवस्था को लेकर असंतोष चरम पर है। बड़ा सवाल यही है— क्या शासन की योजनाओं का लाभ वास्तव में पात्र हितग्राहियों तक पहुंच रहा है, या फिर व्यवस्था में वही सफल है जिसकी पहुंच और चढ़ावा मजबूत है। जब तक इस प्रश्न का पारदर्शी उत्तर नहीं मिलता, तब तक “जिसने चढ़ावा चढ़ाया, उसी को प्रसाद मिला” जैसी चर्चाएं प्रशासन की साख पर लगातार चोट करती रहेंगी।
