महाराष्ट्र की राजनीति में चल रही अंदरूनी खींचतान अब संसद भवन तक पहुंच चुकी है। विधानसभा के बाद अब लोकसभा के स्तर पर भी पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना (UBT) में बड़ा विभाजन हो गया है। पार्टी के असंतुष्ट और बागी गुट के सांसदों ने बुधवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की।
इस मुलाकात के दौरान बागी सांसदों ने लिखित रूप से यह दावा पेश किया कि वे अब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले दल का हिस्सा नहीं हैं और संसदीय दल के भीतर उनकी संख्या दो-तिहाई से अधिक है। इस बड़े घटनाक्रम के बाद देश के सबसे बड़े सदन के भीतर शिवसेना के नियंत्रण को लेकर रस्साकशी बेहद तेज हो गई है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपा 7 बागी सांसदों का समर्थन पत्र
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, बागी सांसदों का यह मंडल बुधवार दोपहर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक औपचारिक पत्र सौंपा, जिसपर शिवसेना (UBT) के कुल 6 लोकसभा सांसदों के हस्ताक्षर मौजूद थे। बागी गुट का दावा है कि संसदीय दल के भीतर लोकतांत्रिक रूप से उनके पास पर्याप्त संख्या बल है, जिसके आधार पर उन्हें सदन की कार्यवाही के दौरान एक अलग और स्वतंत्र विधायी गुट के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से यह भी अनुरोध किया कि सदन के भीतर उनके बैठने की व्यवस्था को बदला जाए और उद्धव ठाकरे गुट के मुख्य कार्यालय से इतर उन्हें नया रणनीतिक स्थान आवंटित किया जाए।
दलबदल कानून के तहत केस दर्ज कराने और सदस्यता निरस्त करने की विधिक तैयारी
दूसरी ओर, इस बगावत की खबर मिलते ही उद्धव ठाकरे गुट के शीर्ष नेतृत्व और मुख्य सचेतक ने इस कदम को पूरी तरह असंवैधानिक करार दिया है। ठाकरे गुट के कानूनी सलाहकारों ने बागी सांसदों के खिलाफ संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दलबदल विरोधी कानून के तहत केस दर्ज कराने का पूरा ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया है।
पार्टी के प्रवक्ताओं का कहना है कि मूल राजनैतिक दल की अनुमति और आधिकारिक व्हिप के बिना किसी भी अन्य गुट के साथ हाथ मिलाना सीधे तौर पर जनप्रतिनिधित्व कानून का खुला उल्लंघन है। उद्धव गुट बहुत जल्द लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष एक आधिकारिक याचिका दायर करने जा रहा है, जिसमें इन सभी 6 बागी सांसदों की संसद सदस्यता को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की मांग की जाएगी।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उद्धव ठाकरे को लगा अब तक का सबसे बड़ा झटका
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद के मॉनसून सत्र और आगामी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुआ यह विभाजन उद्धव ठाकरे के राजनीतिक अस्तित्व के लिए एक बहुत बड़ी चोट है। इससे पहले एमएलसी कृपाल तुमाने ने ‘ऑपरेशन टाइगर’ के तहत जिस बड़ी टूट का दावा किया था, वह अब धरातल पर सच होती दिखाई दे रही है।
इस विभाजन के बाद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट की साख और उनका राजनीतिक कद दिल्ली के स्तर पर काफी मजबूत हो गया है। बहरहाल, संसद के भीतर इस विभाजन को आधिकारिक मान्यता मिलने के बाद महाविकास अघाड़ी (MVA) के भीतर भी सीट शेयरिंग और चुनावी रणनीतियों को लेकर नीति निर्माताओं में मची खलबली और तेज होना तय माना जा रहा है।
